
रायपुर। छत्तीसगढ़ के जंगलों में मौजूद औषधीय जड़ी-बूटियां अब केवल इलाज का साधन नहीं रहीं, बल्कि ग्रामीण और वनांचल क्षेत्रों की महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण का बड़ा माध्यम बन रही हैं। राज्य सरकार की नई कार्ययोजना के तहत गिलोय, कालमेघ, बहेड़ा, सफेद मूसली, अश्वगंधा, शतावरी, जंगली हल्दी और गुड़मार जैसी वनौषधियों से अर्क, चूर्ण, तेल और अन्य उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। इससे महिला स्व-सहायता समूहों को रोजगार और आय के नए अवसर मिल रहे हैं।
छत्तीसगढ़ में पारंपरिक वैद्य ज्ञान को वैज्ञानिक पद्धति से जोड़ने की दिशा में भी काम तेज हुआ है। स्थानीय वैद्यों और जड़ी-बूटी विशेषज्ञ महिलाओं की पहचान कर उनके अनुभव को संरक्षित किया जा रहा है। राज्य में 1500 से अधिक सक्रिय वैद्यों के ज्ञान का उपयोग करते हुए हर्बल खेती, प्रसंस्करण और विपणन को बढ़ावा दिया जा रहा है। इससे ग्रामीण महिलाएं अब सिर्फ संग्रहकर्ता नहीं, बल्कि निर्माता और उद्यमी बनकर उभर रही हैं।
राज्य सरकार ‘छत्तीसगढ़ हर्बल्स’ ब्रांड के जरिए इन उत्पादों को राष्ट्रीय और वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में आगे बढ़ रही है। प्रदर्शनियों, रिटेल आउटलेट्स और बाजार आधारित रणनीति से उत्पाद सीधे उपभोक्ताओं तक पहुंच रहे हैं। महिला समूहों को मदर नर्सरी, पौध उत्पादन और औषधीय खेती से जोड़ा गया है, जिससे सालभर रोजगार मिल रहा है। यह पहल महिलाओं की आय बढ़ाने के साथ छत्तीसगढ़ को देश का उभरता हर्बल हब बनाने की दिशा में मजबूत कदम मानी जा रही है।